एक एक कर टूटे सारे,नींद नहीं क्यों आ पाती है, मैं तो गलकर पिघल गया हूँ,फिर क्यों पत्थर सी छाती है , ओ ,मेरे सुकुमार सलोनो ,पंछी बनकर देखो अब तुम , दिन भर उड़ते रहते हैं जो,संध्या जिनको दुलराती है , जाओ,उनके जैसे हो लो ,मैं करवट में तकिये रख लूं
बुधवार, 22 सितंबर 2010
लोग मुझसे हैं परेशाँ,क्या करूँ मैं मानता हूँ , दर्द मेरा बह रहा है ,किस तरह से जानता हूँ , हद गुजरकर रह गई है ,कौन समझेगा यहाँ पर , आंसुओं के टापुओं में ,बस उतरना जानता हूँ, कुछ लतायें मिल रही हैं , छू तुझे जो आ रही है