गुरुवार, 23 सितंबर 2010

एक एक कर टूटे सारे,नींद नहीं क्यों आ पाती है,
मैं तो गलकर पिघल गया हूँ,फिर क्यों पत्थर सी छाती है ,
ओ ,मेरे सुकुमार सलोनो ,पंछी बनकर देखो अब तुम ,
दिन भर उड़ते रहते हैं जो,संध्या जिनको दुलराती है ,
जाओ,उनके जैसे हो लो ,मैं करवट में तकिये रख लूं

बुधवार, 22 सितंबर 2010

लोग मुझसे हैं परेशाँ,क्या करूँ मैं मानता हूँ ,
दर्द मेरा बह रहा है ,किस तरह से जानता हूँ ,
हद गुजरकर रह गई है ,कौन समझेगा यहाँ पर ,
आंसुओं के टापुओं में ,बस उतरना जानता हूँ,
कुछ लतायें मिल रही हैं , छू तुझे जो आ रही है