शनिवार, 31 जुलाई 2010

बहुत तूफ़ान हैं मन में
उन्हें खामोश रहने दो
अगर मौजों ने छेड़ा तो
किनारे टूट जायेंगे
तुम्हारे प्यार के बादे
रखे हैं जो लिफाफों में
उन्हें लवरेज रहने दो
सहारे छूट जायेंगे
समुन्दर हो या दरिया हो
भरे हैं सब निग़ाहों में
तुम्हारी प्यास है इतनी
पियें तो सूख जायेंगे
उमर भर साथ रहने की
तुम्हारे साथ कसमें थीं
जिए हम जा रहे हैं पर
ज़माने बीत जायेंगे
कभी तो वक्त आएगा
तुम्हें जो पास लायेगा
मिलोगी जब लिपटकर तुम
नज़ारे झूम जायेंगे

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

प्यार क्या है ,पूछना मत
उस कली से ,जो खिली है
आंसुओं की ओस पीकर
रूप क्या है ,पूछना मत
भोर की पहली किरन से
जो उगी है धूप बनकर
और मैं क्या हूँ यहाँ पर
पूछना मत जिन्दगी से
जो उड़ी है खाक बनकर
हो सके तो बस जरा सा
दर्द पी लो ,आचमन में
जो उमड़कर बह रहा है
गीत मैंने क्यों लिखे हैं
पूछना मत ,उस पवन से
जो मलय -सा बह रहा है
इस जगत का दुन्द में हूँ
और हूँ आकार भी कुछ
क्या बचा है शेष मुझमें-
पूछना मत तितलियों से
रंग जो छिटका चमन में
क्या संदेसा दे रहा है

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

वो सजीले नयन तेरे
क्या नहीं थे ,क्या नहीं थे
वो रसीले बैन तेरे
बांसुरी से कम नहीं थे
चंदनी-खुशबू हवा में
जब घुली तुझसे घुली थी
चांदनी नभ की धरा पर
जब खिली तुझसे खिली थी
क्या बहारों में रखा था
जश्न तेरे कम नहीं थे
छा गयीं मदहोशियाँ -सी
जिन्दगी में कुछ हमारी
धडकनों में गूंजती थीं
धडकनें आधी तुम्हारी
क्या बचाते हम जिगर को
तीर तेरे कम नहीं थे
बादलों में ,सागरों में
सिर्फ तेरा ही उमड़ना
देखने की जिद हमें थी
डूब कर तुझमें उतरना
झील की गहराइयों में
चाँद तेरे कम नहीं थे

रविवार, 25 जुलाई 2010

मोहब्बत का ये आलम है
हवाएं गुनगुनाई हैं
घिरे आकाश में बादल
जमीनें भी नहायीं हैं
चलो हम मान लेते हैं
तुम्हारा प्यार बरसा है
मगर क्यों आँख में अबतक
निशायें डबडबायीं हैं
सड़क पर साथ भीगे थे
समंदर में नहाये थे
हमारे मखमली से पल
नजारों ने चुराए थे
बहारें खुद लिपटतीं थीं
तुम्हारे तन-बदन से जब
सुबह से शाम तक वो दिन
इशारों में बिताये थे
हरारत का ये आलम है
दिशाएं सनसनायीं हैं
तुम्हारी याद के बादल
बरसते छोड़ आयीं हैं

शनिवार, 24 जुलाई 2010

मैं जीवित हूँ मेरा भ्रम है
जिन्दा तो बस मेरा श्रम है
थोडा -सा धन मैं पा जाऊं
अपनीकीमत कहाँ लगाऊं
वक्त भला क्यों तेरा ज्यादा
मेरा कैसे इतना कम है
मैं किस्मत से टकराता हूँ
किस्मत तेरी हो जाती है
मेरे हाथों से ही ये क्यों
फिसल -फिसल कर रह जाती है
तेरी ताकत कैसे ज्यादा
मेरी कैसे इतनी कम है
मेरे पास धड़कता दिल है
तेरे पास हजारों सपने
कोई सपना मेरा भी हो
छलक चुके हैं आंसू कितने
दो -रोटी का दाना -पानी
कर लूं मुझमें जितना दम है
अच्छा है धनवान नहीं हूँ
धरती का भगवान नहीं हूँ
मुझे अभावों ने पाला है
इस सच से अनजान नहीं हूँ
मुझको बस अपनों का गम है
नंगा हूँ पर तपा बदन है
संभल -संभल कर सांसें चलती
यादों में जब तुम आती हो
एक हवा का झोंका बनकर
मुझमें जैसे छा जाती हो
भीगा -भीगा कोई मौसम
मेरे चारों ओर खड़ा है
इस मौसम की पलकों में तुम
सपने भी कुछ भर जाती हो
रचते -रचते सूरत कोई
सिर्फ तुम्हारी रच जाती है
आँखें जब तक खुल कर देखें
ऊषानभ में छा जाती है
मन में जितना सूनापन है
उसका कोई छोर नहीं है
विस्तृत जग में सिवा तुम्हारे
दूजा कोई और नहीं है
सात -जनम के परिवेशों से
गुजर -गुजर कर तुम आती हो
विरह -मिलन के अनुभावों में
प्यार असीमित भर जाती हो
संभल -संभल कर सांसें चलती
यादों में जब तुम आती हो
एक हवा का झोंका बनकर
मुझमें जैसे छा जाती हो
भीगा -भीगा कोई मौसम
मेरे चारों ओर खड़ा है
इस मौसम की पलकों में तुम
सपने भी कुछ भर जाती हो
रचते -रचते सूरत कोई
सिर्फ तुम्हारी रच जाती है
आँखें जब तक खुल कर देखें
ऊषानभ में छा जाती है
मन में जितना सूनापन है
उसका कोई छोर नहीं है
विस्तृत जग में सिवा तुम्हारे
दूजा कोई और नहीं है
सात -जनम के परिवेशों से
गुजर -गुजर कर तुम आती हो
विरह -मिलन के अनुभावों में
प्यार असीमित भर जाती हो

रविवार, 18 जुलाई 2010

बुझ गया मन आज ऐसे
ढल रही है शाम जैसे
मैं सिसक कर रो उठा हूँ
रो रही है वात जैसे
घिर रही पर्छाइयाँ कुछ
इस तरह मेरे नयनं में
उम्र की देकर किसी ने
छीन ली सौगात जैसे
वो चमकता रूप देखो
एक गीला अश्रु बनकर
प्रीत की सारी कहानी
कह रहा चुप चाप ढलकर
खुल रहीं हैं दर्द की परतें
छितिज की ओट में यों
उड़ रहे हैं जिस तरह से
बादलों के पाल सर -सर
वो किनारा दूर है तो
ये किनारा भी अछूता
कौन ऐसा पुन्य है जो
पाप से पहले न छूटा
व्यक्तित्व जितना भी उठा
आदर्श उतने गिर गए
मैं मनुजता के लिए भी
जी न पाया ,रोज टूटा
इस घुमड़ती रागिनी के
स्वर बहुत बिखरे हुए हैं
झूमकरअब क्या सुनाऊं
गीत के टुकड़े हुए हैं
शून्य -सा फैला हुआ है
कांपता आँचल किसी का
मैं लिपटकर ओढ़ लूँगा
अंग भी ठिठुरे हुए हैं
मानलूँगाअब समय की
भीत को विश्वास अपना
और बिखरे केश दर्पण में
न देखूंगा कभी भी
आ गया हूँ इन सुलगती
वादियों में लडखडा कर
क्या पराजित भावना से
पा सकूंगा कुछ कभी भी
बुझ गया मन .............

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

चांदनी चन्दन बनी है
तुम नहाती जा रही हो
खुशबुओं में एक खुशबु
तुम उड़ाती जा रही हो
सृष्टि का निर्माण जैसे
आज फिर से हो रहा है
ताल की हर बूंद को तुम
मय बनती जा रही हो
झिलमिलाती -जलतरंगें
छू तुम्हें पागल हुईं हैं
दिलकशी इतनी बड़ी है
धड़कने घायल हुई हैं
वक्त जैसे कुछ ठहरकर
वक्त से कतरा रहा है
एक ठंडी आग जैसे
तुम बहाती जा रही हो
छा गयी हो तुम यहाँ पर
कौन -सा विस्तार लेकर
उन्मनी -सी हो गई है
रौशनी आकार लेकर
रूप का इतना खजाना
किस तरह ये लुट रहा है
पारदर्शी -डुबकियों से
तुम लुभाती जा रही हो
जिन्दगी जन्नत बनेगी
इस तरह सोचा नहीं था
अप्सरा -सी तुम मिलोगी
इस तरह सोचा नहीं था
लग रहा आज तुम पर
रीझ सकता है विधाता
तैरकर तुम हंसिनी -सी
दिल चुराती जा रही हो
चांदनी ,चन्दन बनी है ....

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

अगर न जीवन जग में होता
इस धरती का फिर क्या होता
जिस दिन तुमको पाया मैंने
उस दिन मौसम मुखर हुए थे
मन से मन के सारे रिश्ते
उस दिन ही तो अमर हुए थे
चाँद खिला था उस दिन नभ में
शायद पहली बार यहाँ पर
उस दिन ही तो तन से लिपटे
तन के शोले प्रखर हुए थे
हम दोनों जो अगर न होते
इस धरती का फिर क्या होता
नदियाँ शायद बहते -बहते
अपनी लहरों में खो जातीं
कौन नहाता उनमें जाकर
किसके सारे पाप धुलातीं
सूरज -चंदा उगते -उगते
ठगे -ठगे से ही रह जाते
कौन निहारा करता उनको
सुबह न आतीं शाम न आतीं
आवाहन ही जब न होता
इस धरती का फिर क्या होता
शायद ये चिरकाल बंधा है
इस जीवन के ही छोरों से
ये धरती भी पुलक रही है
नए सृजन की नव डोरों से
मेघों में मल्हार न होता
इस धरती का फिर क्या होता

बुधवार, 14 जुलाई 2010

तुने जितना प्यार किया था
नहीं तुलेगा किसी नजर से
मेरी नजरें बहते - बहते
मिलें न जब तक तेरी नजर से

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

छुपे -छुपे ही रह जाते हैं
अक्सर आँखों में कुछ आंसू
जीने वाले जी लेते हैं
पी -पी कर ही अपने आंसू .
कोई ऐसा दर्द नहीं है
जो आंसू में नहीं नहाया
कोई ऐसा प्यार नहीं है
जिसने मन को नहीं तपाया .
तपते -तपते रह जाते हैं
भीगे -मौसम में कुछ आंसू .
ये आंसू की अविरल गंगा
सदियों से बहती आई है
मन के कितने अंगारों की
बूंदों से प्यास बुझाई है .
बुझते -बुझते रह जाते हैं
दीपक की लौ जैसे आंसू .
आंसू जब तक गीत लिखें ना
गीत न पूरा हो पाता है
आंसू जबतक भाप बने ना
मीत न कोई मिल पाता है
मिलते - मिलते रह जाते हैं
तेरे आंसू में ये आंसू

सोमवार, 12 जुलाई 2010

इस धड़कती शाम ने क्या
दिल तुम्हारा छू लिया है
बात मेरी कुछ नहीं है
ये अभी तो सिलसिला है ,
आपका कोई तबस्सुम
शाम में सिमटा हुआ है
ये नयी कोई गजल है
या जरा -सा फासला है ,
शाम डूबी जा रही है
आपसे पूछे बिना ही
शाम को कैसे बताएं
आपमें जो जलजला है