चांदनी चन्दन बनी है
तुम नहाती जा रही हो
खुशबुओं में एक खुशबु
तुम उड़ाती जा रही हो
सृष्टि का निर्माण जैसे
आज फिर से हो रहा है
ताल की हर बूंद को तुम
मय बनती जा रही हो
झिलमिलाती -जलतरंगें
छू तुम्हें पागल हुईं हैं
दिलकशी इतनी बड़ी है
धड़कने घायल हुई हैं
वक्त जैसे कुछ ठहरकर
वक्त से कतरा रहा है
एक ठंडी आग जैसे
तुम बहाती जा रही हो
छा गयी हो तुम यहाँ पर
कौन -सा विस्तार लेकर
उन्मनी -सी हो गई है
रौशनी आकार लेकर
रूप का इतना खजाना
किस तरह ये लुट रहा है
पारदर्शी -डुबकियों से
तुम लुभाती जा रही हो
जिन्दगी जन्नत बनेगी
इस तरह सोचा नहीं था
अप्सरा -सी तुम मिलोगी
इस तरह सोचा नहीं था
लग रहा आज तुम पर
रीझ सकता है विधाता
तैरकर तुम हंसिनी -सी
दिल चुराती जा रही हो
चांदनी ,चन्दन बनी है ....
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