अगर न जीवन जग में होता
इस धरती का फिर क्या होता
जिस दिन तुमको पाया मैंने
उस दिन मौसम मुखर हुए थे
मन से मन के सारे रिश्ते
उस दिन ही तो अमर हुए थे
चाँद खिला था उस दिन नभ में
शायद पहली बार यहाँ पर
उस दिन ही तो तन से लिपटे
तन के शोले प्रखर हुए थे
हम दोनों जो अगर न होते
इस धरती का फिर क्या होता
नदियाँ शायद बहते -बहते
अपनी लहरों में खो जातीं
कौन नहाता उनमें जाकर
किसके सारे पाप धुलातीं
सूरज -चंदा उगते -उगते
ठगे -ठगे से ही रह जाते
कौन निहारा करता उनको
सुबह न आतीं शाम न आतीं
आवाहन ही जब न होता
इस धरती का फिर क्या होता
शायद ये चिरकाल बंधा है
इस जीवन के ही छोरों से
ये धरती भी पुलक रही है
नए सृजन की नव डोरों से
मेघों में मल्हार न होता
इस धरती का फिर क्या होता
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