गुरुवार, 4 नवंबर 2010

चिर -दीपक लघु -पल -पल घुल-घुल ';
रजनी की पलकों में दुल-दुल ;
रचता संसृति की छवियों का ;
ज्योतिर्मय -मरकत रूप विपुल ;
झोंपड़ियों से प्रासादों तक ;
अवलि सजाकर किरण पुंज की ;
भर देता उदगारों से नव ;
पुलकावलियाँ अलसकुञ्ज की ;
विश्वासों का सूत्रधार यह ;
आशाओं का सृजनहार यह ;
अपनी कम्पित लौ से कितना ;
उंडलाता है अमित प्यार यह ;

शोषित --दलित -ग्रसित मानव का ;
परिचय देता रज काया से ,
संघर्षों का अग्रदूत यह ;
टकराता है हर छाया से

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

वक्त शायद खींच लाये ,फिर तुम्हें अब पास मेरे ,
मुश्किलें जितनी खड़ीं थीं,मात सारी हो गईं हैं

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

मेरी आँखों में जो छायीं ,सिर्फ उसी की तस्वीरें हैं ,
शायद कोई संग- तराशी ,हाथ कटा तुमको मिल जाये
धुआं भरा जितना मुझमें , वो बाहर तो निकलेगा ही ,
शायद उसकी चादर में वो ,लिपटा चाँद तुम्हें दिख जाये

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

आओ मुझसे मिलकर रोलो ,सूनी-सूनी दीवारों तुम ,
शायद कोई ताजमहल का ,पत्थर तुम पर भी जड़ जाये

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

मेरे घर के बाहर इक जंगल उग आया है ,तरह -तरह की घासें ,
तरह के पौधे ,कुछ कोमल , कुछ नोकीले, झाड़ों का दंगल छाया है ,
कुछ गिलहरीं फुदकीं ,खरगोशों ने दौड़ लगाई ,रंग -बिरंगी तितलीं,
अलवेली -सी झूमीं ,
नन्ही -नन्ही चिड़ियों ने कलरव गाया है ,
तरुओं की शाखायें झुक - झुक कर लहराईं ,
फूलों पर यौवन गदराया है

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

कहते हैं जब वर्फ पिघलती ,नदियाँ ,सागर बन जाते हैं;
तेरे मेरे बीच कहीं ये ,छलक-छलक रह जाते हैं ;
इनकी सारी अनुगूंजों को ,गीत बनाकर रख लेता हूँ ;
अक्सर तुझको इन आँखों में ,कहीं बसाकर रख लेता हूँ ;
ओस बिछी है पूरे पथ पर,मैं तुझमें इतना भीगा हूँ;
कलियों के खिलने से पहले ,जिस्म गलाकर चल देता हूँ;
मेरी काया ,तेरी काया ,है मिट्टी का एक खिलौना ;
तेरी यादों की बस इसमें ,रूह मिलाकर चल देता हूँ ;

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

अक्सर तुझको इन आँखों में ,कहीं बसाकर रख लेता हूँ;
एक किरन जो छिटक गई है, उसे जलाकर रख लेता हूँ;
जीवन के ये लम्बे रस्ते ,चलने से जब भी कतराते ;
शर्तें तेरी जो होतीं थीं ,इन्हें सुनाकर चल देता हूँ ;
एक दिवस फिर बीता-बीता ,
एक दिवस फिर रीता-रीता,
एक दिवस में उठे कदम जो,
कोई कितना हारा ,जीता,
एक दिवस की यही कहानी ;
एक दिवस की यही रवानी,
एक दिवस में ,किसने कितनी ,
करली, अपनी हर मनमानी ;
एक दिवस कितनों के घर में ;
खुशहाली से भरकर बीता ;
कोई खाली हाथों लौटा ,
कोई भरकर जेबें लौटा ;
कोई अपने दिल के कतरे ,
इस दुनिया को देकर लौटा;
एक दिवस पनघट से घर तक;
कितना प्यासा-प्यासा लौटा;
एक दिवस कब पूरा होगा ;
नहीं पता है यहाँ किसी को ,
एक दिवस की धूप -छाँव में ;
खो जाना है यहाँ सभी को ;
एक दिवस भरमाया -सा था ;
एक दिवस कुछ करके बीता

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

आजकल आप पूरी तरह आजाद हैं ,चाहे जो लिखें ,सुबह से शाम तक की किसी मामूली
घटना का बर्णन करदें ,चाहे जो कुछ परोस दें ,लंगर लगा है ,कोई छंद -शास्त्र नहीं , कोई काव्य शास्त्र
नहीं कोई भावभूमि नहीं ,आप जो कुछ लिखेंगे लालू के दरवार में चलेगा ....
लेकिन छाया वादी कवियों की परम्परा बच्चन जी का हालावाद आज भी
अपने शीर्ष पर है ,उनके बाद के कवि हाशिये पर भी नहीं दिखाई देते ,लेने को दो चार के नाम लिए जा सकते हैं ,
लेकिन जो कुछ भी सामने आया है एक दम साधारण है ,कोई युग बोध नहीं ,कुछ भी विलक्षण नहीं
आधुनिक काल में नीरज के बाद या सन ,१९६५ से पत्र पत्रिकाओं में ,नयी कविता का दौर चल
पड़ा ,न जाने कितने प्रयोगवादी नुख्से अपनाये गये जो अब तक चले आ रहे हैं ,तुक और छंदों
वाली कविता का बहिष्कार किया गया ,नयी कविता में कुछ भी लिखना आसान है ,किसी शास्त्रीय
ज्ञान की आवश्कता नहीं ..
बचपन में एक फिकरा सुना था ---सूर -सूर ,तुलसी शशि ,उडगन केशवदास ,
अबके कवि खद्योत सम ,जेंह तेंह करत प्रकाश
क्या भक्ति काल-रीति काल जो एक परिपाटी पर केन्द्रित था आज भी
उतना ही सामयिक ,प्रासंगिक है ,क्या उनकी रचनायें आज के कवियों पर भारी
पड़ती हैं
इस युग में काव्य बिलकुल शब्द चित्र की तरह था ,भाषा चाहे अवधि हो या ब्रज गेय थी ,
हाँलाकि रस ,अलंकार,उपमाओं का प्रयोग था मगर कथ्य बास्तविक सा लगता था ,
काव्य के गुणों से भरपूर था
भावाव्यक्ति,काव्य सोन्दर्य के आधार पर चला ,सीता परम रुचिर मृग देखा ,या हे मृग ,हे मधुकर श्रेणि ,तुम देखीं
सीता मृग नयनी ,मीरा --हेरी मैं तो प्रेम दीवानी ,सूर --मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो ,बिहारी जिन दिन देखे वो कुसुम
सो गई बीत बहार

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

रामायण को गाकर ,गुनगुनाकर पदा जा सकता है ,छंदों तथा तुकबंदी का अपना अलग मजा है ,
नीरज तक यह परम्परा निर्वाध जारी रही ,उसके बाद निराला तथा अज्ञेय ने गीति काव्य पर ,
ऊँगली उठा दी ,उनके अनुसार छंदों में भाव व् बिचार खुलकर व्यक्त नहीं होते ,उन्होंने अतुकांत
कविता का श्रीगणेश कर दिया
तुलसीदास जी, की रामायण एक अवतार पुरुष की अमर गाथा है ,पूरा घटनाक्रम ,बहुत ही सरल तरीके से
लिखा गया है ,खड़ी बोली का पाठक ,अवधि में लिखी रचना को बिना प्रयास के ही समझ लेता है ,
रामायण की चोपाइयों में तुक व् मात्रा का प्रयोग है ,जो उसे गीति काव्य की श्रेणी में रखता है
रीति काल के प्रमुख कवियों में ,तुलसीदास,सूरदास ,बिहारी ,मीरा ,कबीर ,जायसी को पढना ,समझना जरूरी है ,
आधुनिक काल में सुभद्रा कुमारी चोहान ,महा देवी वर्मा ,सुमित्रा नंदन पन्त ,जय शंकर प्रसाद ,डाक्टर हरिवंश राय
बच्चन ,नीरज को पदे बिना कविता ज्ञान अधूरा ही माना जायेगा
हिंदी काव्य क्या ,कैसा है ,कैसा होना चाहिए ,रीति काल से आधुनिक काल तक उसमें
क्या जुड़ा,क्या शेष रहा ,क्या पसंद आया ,क्यों पसंद आया ,हम जब भी कुछ नया
लिखते हैं ,पीछे का पूरा घटना क्रम मस्तिष्क में होता है ...

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

एक एक कर टूटे सारे,नींद नहीं क्यों आ पाती है,
मैं तो गलकर पिघल गया हूँ,फिर क्यों पत्थर सी छाती है ,
ओ ,मेरे सुकुमार सलोनो ,पंछी बनकर देखो अब तुम ,
दिन भर उड़ते रहते हैं जो,संध्या जिनको दुलराती है ,
जाओ,उनके जैसे हो लो ,मैं करवट में तकिये रख लूं

बुधवार, 22 सितंबर 2010

लोग मुझसे हैं परेशाँ,क्या करूँ मैं मानता हूँ ,
दर्द मेरा बह रहा है ,किस तरह से जानता हूँ ,
हद गुजरकर रह गई है ,कौन समझेगा यहाँ पर ,
आंसुओं के टापुओं में ,बस उतरना जानता हूँ,
कुछ लतायें मिल रही हैं , छू तुझे जो आ रही है

शनिवार, 28 अगस्त 2010

तेरी यादों के हसीं पल ,जब भी गुनगुनायेंगे
जिन्दगी तो क्या ,हम मौत को भी गले लगायेंगे

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

बिजलियों का एक घर है ,
मैं उसी में जल रहा हूँ ,
रौशनी बिखरी हुई है ,
मैं उसी में गल रहा हूँ ,
जानता हूँ कुछ नहीं है ,
जो मुझे हासिल यहाँ हो ,
किन्तु तेरे वास्ते बस ,
मैं ,तुझी में ढल रहा हूँ l

बुधवार, 25 अगस्त 2010

दिल थका ,आँखें थकीं ,अब हम बिखरना चाहते हैं
मौत इतनी पास आये हम संभलना चाहते हैं

शनिवार, 21 अगस्त 2010

कतरे -कतरे दिल के बिखरे ,
जीने को बस हम जीते हैं ,
पता नहीं क्यों इस दुनिया का ,
एक समुन्दर गम पीते हैं ,
बिखरे -काँचों को जब बीना ,
किरचें उंगुलियों में चिपकीं ,
बिखरे आँसू को जब बीना ,
बूँदें ,होठों पर ही चिपकीं ,
इन बूँदों के ,इन किरचों के ,
खून भला कब कम होते हैं ,
नहीं पता था ,बिना तुम्हारे ,
नदियाँ ,पर्बत ,रह जायेंगे ,
नहीं पता था ,नभ के बादल ,
आँखों में ही घिर जायेंगे ,
ये नदियाँ ,ये पर्बत ,बादल ,
बिना तुम्हारे क्यों रोते हैं ,
कुछ तो ऐसी ,अगन पली है ,
बिना तुम्हारे शाम ढली है ,
उम्मीदों की एक सुबह भी ,
सीने में गुमनाम जली है ,
मुझसे मेरा हाल न पूछो ,
चिता- दहन क्यों नम होते हैं

बुधवार, 18 अगस्त 2010

इस धड़कती शाम ने क्या
दिल तुम्हारा छू लिया है ,
बात मेरी कुछ नहीं है ,
ये अभी तो सिलसिला है ,
आपका कोई तबस्सुम ,
शाम में सिमटा हुआ है ,
ये नयी कोई गज़ल है ,
या नजर का फासला है ,

शाम डूबी जा रही है ,
आपसे पूछे बिना ही ,
शाम को कैसे बतायें,
आप में जो जलजला है

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

एक नदी की धारा सूखी.
रेत कणों- सा जीवन बिखरा ,
जो भी आया यहाँ नहाने ,
आँखों से बस आँसू उतरा ,
पल दो पल का साथ यहाँ था ,
पल दो पल के थे सब साथी ,
किसने कितना साथ निभाया ,
किसने कितनी घात लगा दी ,
पता नहीं क्यों इन्हीं कणों में ,
चक्र ,समय का ,आकर उतरा ,
कोई मुझसे पूछ रहा है ,
कब तक सूरज ,चाँद उगेंगे ,
कब तक धरती टिक पायेगी,
कब तक मन में नाद उठेंगे ,
में क्या बोलूँ -उत्तर देगा ,
इन्हीं कणों का कतरा -कतरा ,
देखो कोई फूल खिला है ,
इनकी भीगी नम पलकों पर ,
मैंने भी इक गीत लिखा है ,
इनकी बिखरी -सी अलकों पर ,
बस इतना सामान बचा है ,
बाकी सब तो है बस कचरा ,

बुधवार, 11 अगस्त 2010

आज मेरी है परीक्षा
ऐ वतन तेरे लिए
तोड़कर गजरा किसी ने
फूल तेरे नोच डाले
आँख में जो स्वप्न थे वो
दुश्मनों को बेच डाले
कौन सी तेरी ख़ुशी अब
रह गई है आज जिन्दा
कौन है जो आज तेरे
आंसुओं को पोंछ डाले
झूलती मन में अपेक्षा
ऐ वतन तेरे लिए
पर्व तेरे लग रहे हैं
आज फीके क्यों यहाँ पर
आदमी क्यों मिल रहे हैं
आज दिल से दिल बचाकर
कौन सा संताप तेरे
आज मन में चुभ रहा है
कौन -सी वो चीज है जो
छिन गई तुझसे यहाँ पर
दूंदने की है प्रतीज्ञा
ऐ वतन तेरे लिए
चाहता हूँ आज तेरे
पथ दुशालों से सजाऊँ
आज तेरी धडकनों में
धडकनें अपनी मिलाऊँ
आज तेरे पर्वतों पर
ताज धर दूँ इस धरा का
हों अँधेरे दूर जिससे
वो मशालें फिर जलाऊँ
आखिरी है ये प्रतीक्षा
ऐ वतन तेरे लिए

सोमवार, 9 अगस्त 2010

किस्मतों को अब बदलने का
ज़माना आ गया है ,
आज लड़ना है किसी से ,
तो लड़ो उन बिजलियों से ,
जो चमन पर गिर रहीं हैं ,
आज बढना है यहाँ पर ,
तो चदो उन चोटियों पर ,
जो गगन से मिल रहीं हैं .
रौशनी को अब जगाने का ,
ज़माना आ गया है ,
उस धर्म को धिक्कार दो ,
जो आदमी को बाँट दे ,
उस रस्म को ललकार दो ,
जो जड़ किसी की काट दे ,
दोस्तों को आजमाने का ,
ज़माना आ गया है ,
ये वतन अपना वतन है ,
आन इसकी ,शान अपनी ,
हर तरह के फूल इसमें ,
है यही पहचान अपनी ,
इस वतन को जगमगाने का ,
ज़माना आगया है ,
बुझ न जाएँ वो मशालें ,
जो शहीदों ने जलाईं ,
सो रहीं थीं जो उमंगें ,
खून से अपने जगाईं ,
उन शहीदों को उठाने का ,
ज़माना आ गया है

बुधवार, 4 अगस्त 2010

ऐ वतन तुम्हारे सीने में
धीरे -धीरे कुछ जलता है
कभी विरह में ,कभी अगन में ,
कभी विचारों की उलझन में
हो जाता है मौसम पागल
गंगा का पानी छलता है
कोई तुमको नोच रहा है
कोई तुमको बाँट रहा है
ताजमहल की दीवारों पर
काले अक्षर छाप रहा है
गरल पिलाने वाले तुमको
अन्दर ज्यादा ,बाहर कम हैं
चलती चाकी ,कबिरा रोया
मनुआ उसमें क्यों पिसता है
दर्द तुम्हारा जनगीता में
किस दिन अपनी कथा लिखेगा
कौन हजारों आंसू पीकर
कुर्बानी के सफ़े लिखेगा
दहन तुम्हारा करने वाले
आखिर खुद भी जल सकते हैं
कैसे उनको समझाएं अब
रोज शरम से सर झुकता है
ऐ वतन तुम्हारे .....

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

पूछ रहा है तुमसे पल -पल
रोज तुम्हारा हिंदुस्तान
वापस लाओगे तुम कब तक
इसके अधरों की मुस्कान
इसके अरमानों में कोई
अरमान तुम्हारा भी होगा
इसकी आँखों के तारों में
अभिमान तुम्हारा भी होगा
तुम चाहो तो ला सकते हो
इसमें कोई नया विहान
कहीं भूख है कहीं गरीबी
कहीं किसी की लाचारी है
कहीं घूस है ,कहीं लूट है
कहीं किसी की मक्कारी है
कुचल रहा है अपने घर में
अपने लोगों से इंसान
सबका हक़ सबको मिल जाए
अन्याय न तुमपर हो पाए
तुम जितनी मेहनत करते हो
उसका फल तुमको मिल जाए
आज तुम्हारे हाथों में है
इसका जैसे हर अभियान
तुम चाहो तो बदल के रख दो
इसके सारे अंध- विधान

सोमवार, 2 अगस्त 2010

बांध दो ऐसी हवा तुम
ये देश अपना -सा लगे
ये गाँव अपना -सा लगे
ये खेत अपना -सा लगे
साँस लेती -सी नजर
आने लगे फिर जिन्दगी

ये सुबह अपनी लगे
ये शाम अपनी -सी लगे
फर्ज कोई है हमारा
इस शिवालय के लिए

कौन -सी पह्चान दोगे
इस हिमालय के लिए
ताज से कह दो तुम्हारी
सुष्मिता लज्जित न हो
तक्षशिला की ज्ञान -गंगा
गर्व से वंचित न हो
खोल दो वो खिड़कियाँ
जो रौशनी छाने लगे
ये सभ्यता अपनी लगे
ये आदमी अपना लगे
भेद कोई हो न पाए
राम में रहमान में
डाल दो बुनियाद ऐसी
हजरते इंसान में
आस्थाओं से हमारी
ये वतन जुड़ता रहे
फूल इसके शीश पर हों
फूल सा खिलता रहे
हो हमारे बीच कोई
एकता मजबूत ऐसी
ये संस्कृति अपनी लगे
सम्मान अपना -सा लगे

शनिवार, 31 जुलाई 2010

बहुत तूफ़ान हैं मन में
उन्हें खामोश रहने दो
अगर मौजों ने छेड़ा तो
किनारे टूट जायेंगे
तुम्हारे प्यार के बादे
रखे हैं जो लिफाफों में
उन्हें लवरेज रहने दो
सहारे छूट जायेंगे
समुन्दर हो या दरिया हो
भरे हैं सब निग़ाहों में
तुम्हारी प्यास है इतनी
पियें तो सूख जायेंगे
उमर भर साथ रहने की
तुम्हारे साथ कसमें थीं
जिए हम जा रहे हैं पर
ज़माने बीत जायेंगे
कभी तो वक्त आएगा
तुम्हें जो पास लायेगा
मिलोगी जब लिपटकर तुम
नज़ारे झूम जायेंगे

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

प्यार क्या है ,पूछना मत
उस कली से ,जो खिली है
आंसुओं की ओस पीकर
रूप क्या है ,पूछना मत
भोर की पहली किरन से
जो उगी है धूप बनकर
और मैं क्या हूँ यहाँ पर
पूछना मत जिन्दगी से
जो उड़ी है खाक बनकर
हो सके तो बस जरा सा
दर्द पी लो ,आचमन में
जो उमड़कर बह रहा है
गीत मैंने क्यों लिखे हैं
पूछना मत ,उस पवन से
जो मलय -सा बह रहा है
इस जगत का दुन्द में हूँ
और हूँ आकार भी कुछ
क्या बचा है शेष मुझमें-
पूछना मत तितलियों से
रंग जो छिटका चमन में
क्या संदेसा दे रहा है

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

वो सजीले नयन तेरे
क्या नहीं थे ,क्या नहीं थे
वो रसीले बैन तेरे
बांसुरी से कम नहीं थे
चंदनी-खुशबू हवा में
जब घुली तुझसे घुली थी
चांदनी नभ की धरा पर
जब खिली तुझसे खिली थी
क्या बहारों में रखा था
जश्न तेरे कम नहीं थे
छा गयीं मदहोशियाँ -सी
जिन्दगी में कुछ हमारी
धडकनों में गूंजती थीं
धडकनें आधी तुम्हारी
क्या बचाते हम जिगर को
तीर तेरे कम नहीं थे
बादलों में ,सागरों में
सिर्फ तेरा ही उमड़ना
देखने की जिद हमें थी
डूब कर तुझमें उतरना
झील की गहराइयों में
चाँद तेरे कम नहीं थे

रविवार, 25 जुलाई 2010

मोहब्बत का ये आलम है
हवाएं गुनगुनाई हैं
घिरे आकाश में बादल
जमीनें भी नहायीं हैं
चलो हम मान लेते हैं
तुम्हारा प्यार बरसा है
मगर क्यों आँख में अबतक
निशायें डबडबायीं हैं
सड़क पर साथ भीगे थे
समंदर में नहाये थे
हमारे मखमली से पल
नजारों ने चुराए थे
बहारें खुद लिपटतीं थीं
तुम्हारे तन-बदन से जब
सुबह से शाम तक वो दिन
इशारों में बिताये थे
हरारत का ये आलम है
दिशाएं सनसनायीं हैं
तुम्हारी याद के बादल
बरसते छोड़ आयीं हैं

शनिवार, 24 जुलाई 2010

मैं जीवित हूँ मेरा भ्रम है
जिन्दा तो बस मेरा श्रम है
थोडा -सा धन मैं पा जाऊं
अपनीकीमत कहाँ लगाऊं
वक्त भला क्यों तेरा ज्यादा
मेरा कैसे इतना कम है
मैं किस्मत से टकराता हूँ
किस्मत तेरी हो जाती है
मेरे हाथों से ही ये क्यों
फिसल -फिसल कर रह जाती है
तेरी ताकत कैसे ज्यादा
मेरी कैसे इतनी कम है
मेरे पास धड़कता दिल है
तेरे पास हजारों सपने
कोई सपना मेरा भी हो
छलक चुके हैं आंसू कितने
दो -रोटी का दाना -पानी
कर लूं मुझमें जितना दम है
अच्छा है धनवान नहीं हूँ
धरती का भगवान नहीं हूँ
मुझे अभावों ने पाला है
इस सच से अनजान नहीं हूँ
मुझको बस अपनों का गम है
नंगा हूँ पर तपा बदन है
संभल -संभल कर सांसें चलती
यादों में जब तुम आती हो
एक हवा का झोंका बनकर
मुझमें जैसे छा जाती हो
भीगा -भीगा कोई मौसम
मेरे चारों ओर खड़ा है
इस मौसम की पलकों में तुम
सपने भी कुछ भर जाती हो
रचते -रचते सूरत कोई
सिर्फ तुम्हारी रच जाती है
आँखें जब तक खुल कर देखें
ऊषानभ में छा जाती है
मन में जितना सूनापन है
उसका कोई छोर नहीं है
विस्तृत जग में सिवा तुम्हारे
दूजा कोई और नहीं है
सात -जनम के परिवेशों से
गुजर -गुजर कर तुम आती हो
विरह -मिलन के अनुभावों में
प्यार असीमित भर जाती हो
संभल -संभल कर सांसें चलती
यादों में जब तुम आती हो
एक हवा का झोंका बनकर
मुझमें जैसे छा जाती हो
भीगा -भीगा कोई मौसम
मेरे चारों ओर खड़ा है
इस मौसम की पलकों में तुम
सपने भी कुछ भर जाती हो
रचते -रचते सूरत कोई
सिर्फ तुम्हारी रच जाती है
आँखें जब तक खुल कर देखें
ऊषानभ में छा जाती है
मन में जितना सूनापन है
उसका कोई छोर नहीं है
विस्तृत जग में सिवा तुम्हारे
दूजा कोई और नहीं है
सात -जनम के परिवेशों से
गुजर -गुजर कर तुम आती हो
विरह -मिलन के अनुभावों में
प्यार असीमित भर जाती हो

रविवार, 18 जुलाई 2010

बुझ गया मन आज ऐसे
ढल रही है शाम जैसे
मैं सिसक कर रो उठा हूँ
रो रही है वात जैसे
घिर रही पर्छाइयाँ कुछ
इस तरह मेरे नयनं में
उम्र की देकर किसी ने
छीन ली सौगात जैसे
वो चमकता रूप देखो
एक गीला अश्रु बनकर
प्रीत की सारी कहानी
कह रहा चुप चाप ढलकर
खुल रहीं हैं दर्द की परतें
छितिज की ओट में यों
उड़ रहे हैं जिस तरह से
बादलों के पाल सर -सर
वो किनारा दूर है तो
ये किनारा भी अछूता
कौन ऐसा पुन्य है जो
पाप से पहले न छूटा
व्यक्तित्व जितना भी उठा
आदर्श उतने गिर गए
मैं मनुजता के लिए भी
जी न पाया ,रोज टूटा
इस घुमड़ती रागिनी के
स्वर बहुत बिखरे हुए हैं
झूमकरअब क्या सुनाऊं
गीत के टुकड़े हुए हैं
शून्य -सा फैला हुआ है
कांपता आँचल किसी का
मैं लिपटकर ओढ़ लूँगा
अंग भी ठिठुरे हुए हैं
मानलूँगाअब समय की
भीत को विश्वास अपना
और बिखरे केश दर्पण में
न देखूंगा कभी भी
आ गया हूँ इन सुलगती
वादियों में लडखडा कर
क्या पराजित भावना से
पा सकूंगा कुछ कभी भी
बुझ गया मन .............

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

चांदनी चन्दन बनी है
तुम नहाती जा रही हो
खुशबुओं में एक खुशबु
तुम उड़ाती जा रही हो
सृष्टि का निर्माण जैसे
आज फिर से हो रहा है
ताल की हर बूंद को तुम
मय बनती जा रही हो
झिलमिलाती -जलतरंगें
छू तुम्हें पागल हुईं हैं
दिलकशी इतनी बड़ी है
धड़कने घायल हुई हैं
वक्त जैसे कुछ ठहरकर
वक्त से कतरा रहा है
एक ठंडी आग जैसे
तुम बहाती जा रही हो
छा गयी हो तुम यहाँ पर
कौन -सा विस्तार लेकर
उन्मनी -सी हो गई है
रौशनी आकार लेकर
रूप का इतना खजाना
किस तरह ये लुट रहा है
पारदर्शी -डुबकियों से
तुम लुभाती जा रही हो
जिन्दगी जन्नत बनेगी
इस तरह सोचा नहीं था
अप्सरा -सी तुम मिलोगी
इस तरह सोचा नहीं था
लग रहा आज तुम पर
रीझ सकता है विधाता
तैरकर तुम हंसिनी -सी
दिल चुराती जा रही हो
चांदनी ,चन्दन बनी है ....

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

अगर न जीवन जग में होता
इस धरती का फिर क्या होता
जिस दिन तुमको पाया मैंने
उस दिन मौसम मुखर हुए थे
मन से मन के सारे रिश्ते
उस दिन ही तो अमर हुए थे
चाँद खिला था उस दिन नभ में
शायद पहली बार यहाँ पर
उस दिन ही तो तन से लिपटे
तन के शोले प्रखर हुए थे
हम दोनों जो अगर न होते
इस धरती का फिर क्या होता
नदियाँ शायद बहते -बहते
अपनी लहरों में खो जातीं
कौन नहाता उनमें जाकर
किसके सारे पाप धुलातीं
सूरज -चंदा उगते -उगते
ठगे -ठगे से ही रह जाते
कौन निहारा करता उनको
सुबह न आतीं शाम न आतीं
आवाहन ही जब न होता
इस धरती का फिर क्या होता
शायद ये चिरकाल बंधा है
इस जीवन के ही छोरों से
ये धरती भी पुलक रही है
नए सृजन की नव डोरों से
मेघों में मल्हार न होता
इस धरती का फिर क्या होता

बुधवार, 14 जुलाई 2010

तुने जितना प्यार किया था
नहीं तुलेगा किसी नजर से
मेरी नजरें बहते - बहते
मिलें न जब तक तेरी नजर से

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

छुपे -छुपे ही रह जाते हैं
अक्सर आँखों में कुछ आंसू
जीने वाले जी लेते हैं
पी -पी कर ही अपने आंसू .
कोई ऐसा दर्द नहीं है
जो आंसू में नहीं नहाया
कोई ऐसा प्यार नहीं है
जिसने मन को नहीं तपाया .
तपते -तपते रह जाते हैं
भीगे -मौसम में कुछ आंसू .
ये आंसू की अविरल गंगा
सदियों से बहती आई है
मन के कितने अंगारों की
बूंदों से प्यास बुझाई है .
बुझते -बुझते रह जाते हैं
दीपक की लौ जैसे आंसू .
आंसू जब तक गीत लिखें ना
गीत न पूरा हो पाता है
आंसू जबतक भाप बने ना
मीत न कोई मिल पाता है
मिलते - मिलते रह जाते हैं
तेरे आंसू में ये आंसू

सोमवार, 12 जुलाई 2010

इस धड़कती शाम ने क्या
दिल तुम्हारा छू लिया है
बात मेरी कुछ नहीं है
ये अभी तो सिलसिला है ,
आपका कोई तबस्सुम
शाम में सिमटा हुआ है
ये नयी कोई गजल है
या जरा -सा फासला है ,
शाम डूबी जा रही है
आपसे पूछे बिना ही
शाम को कैसे बताएं
आपमें जो जलजला है

शुक्रवार, 25 जून 2010

बिछी -बिछी हैं पलकें अबतक
इन पलकों पर बिछे न कोई
बिछे अगर तो मुझसे पहले
तुमसे जाकर पूछे कोई ।
दिल में क्या हैं कुछ धड़कन हैं
जो बस तुमसे ही चलती हैं
उसके खिड़की दरवाजों पर
सिवा तुम्हारे दिखे न कोई .

गुरुवार, 24 जून 2010

अब तक तो बस हमने तेरी
तस्वीरों में रंग भरे हैं
जब ये दिल भी चिपकेगा तो
तेरी सूरत खास लगेगी .