geetonkebadal-[6]
गुरुवार, 23 सितंबर 2010
एक एक कर टूटे सारे,नींद नहीं क्यों आ पाती है,
मैं तो गलकर पिघल गया हूँ,फिर क्यों पत्थर सी छाती है ,
ओ ,मेरे सुकुमार सलोनो ,पंछी बनकर देखो अब तुम ,
दिन भर उड़ते रहते हैं जो,संध्या जिनको दुलराती है ,
जाओ,उनके जैसे हो लो ,मैं करवट में तकिये रख लूं
1 टिप्पणी:
लोकेन्द्र सिंह
24 सितंबर 2010 को 1:08 pm बजे
बहुत सुन्दर।
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बहुत सुन्दर।
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