तेरी यादों के हसीं पल ,जब भी गुनगुनायेंगे
जिन्दगी तो क्या ,हम मौत को भी गले लगायेंगे
शनिवार, 28 अगस्त 2010
शुक्रवार, 27 अगस्त 2010
बुधवार, 25 अगस्त 2010
शनिवार, 21 अगस्त 2010
कतरे -कतरे दिल के बिखरे ,
जीने को बस हम जीते हैं ,
पता नहीं क्यों इस दुनिया का ,
एक समुन्दर गम पीते हैं ,
बिखरे -काँचों को जब बीना ,
किरचें उंगुलियों में चिपकीं ,
बिखरे आँसू को जब बीना ,
बूँदें ,होठों पर ही चिपकीं ,
इन बूँदों के ,इन किरचों के ,
खून भला कब कम होते हैं ,
नहीं पता था ,बिना तुम्हारे ,
नदियाँ ,पर्बत ,रह जायेंगे ,
नहीं पता था ,नभ के बादल ,
आँखों में ही घिर जायेंगे ,
ये नदियाँ ,ये पर्बत ,बादल ,
बिना तुम्हारे क्यों रोते हैं ,
कुछ तो ऐसी ,अगन पली है ,
बिना तुम्हारे शाम ढली है ,
उम्मीदों की एक सुबह भी ,
सीने में गुमनाम जली है ,
मुझसे मेरा हाल न पूछो ,
चिता- दहन क्यों नम होते हैं
जीने को बस हम जीते हैं ,
पता नहीं क्यों इस दुनिया का ,
एक समुन्दर गम पीते हैं ,
बिखरे -काँचों को जब बीना ,
किरचें उंगुलियों में चिपकीं ,
बिखरे आँसू को जब बीना ,
बूँदें ,होठों पर ही चिपकीं ,
इन बूँदों के ,इन किरचों के ,
खून भला कब कम होते हैं ,
नहीं पता था ,बिना तुम्हारे ,
नदियाँ ,पर्बत ,रह जायेंगे ,
नहीं पता था ,नभ के बादल ,
आँखों में ही घिर जायेंगे ,
ये नदियाँ ,ये पर्बत ,बादल ,
बिना तुम्हारे क्यों रोते हैं ,
कुछ तो ऐसी ,अगन पली है ,
बिना तुम्हारे शाम ढली है ,
उम्मीदों की एक सुबह भी ,
सीने में गुमनाम जली है ,
मुझसे मेरा हाल न पूछो ,
चिता- दहन क्यों नम होते हैं
बुधवार, 18 अगस्त 2010
मंगलवार, 17 अगस्त 2010
एक नदी की धारा सूखी.
रेत कणों- सा जीवन बिखरा ,
जो भी आया यहाँ नहाने ,
आँखों से बस आँसू उतरा ,
पल दो पल का साथ यहाँ था ,
पल दो पल के थे सब साथी ,
किसने कितना साथ निभाया ,
किसने कितनी घात लगा दी ,
पता नहीं क्यों इन्हीं कणों में ,
चक्र ,समय का ,आकर उतरा ,
कोई मुझसे पूछ रहा है ,
कब तक सूरज ,चाँद उगेंगे ,
कब तक धरती टिक पायेगी,
कब तक मन में नाद उठेंगे ,
में क्या बोलूँ -उत्तर देगा ,
इन्हीं कणों का कतरा -कतरा ,
देखो कोई फूल खिला है ,
इनकी भीगी नम पलकों पर ,
मैंने भी इक गीत लिखा है ,
इनकी बिखरी -सी अलकों पर ,
बस इतना सामान बचा है ,
बाकी सब तो है बस कचरा ,
रेत कणों- सा जीवन बिखरा ,
जो भी आया यहाँ नहाने ,
आँखों से बस आँसू उतरा ,
पल दो पल का साथ यहाँ था ,
पल दो पल के थे सब साथी ,
किसने कितना साथ निभाया ,
किसने कितनी घात लगा दी ,
पता नहीं क्यों इन्हीं कणों में ,
चक्र ,समय का ,आकर उतरा ,
कोई मुझसे पूछ रहा है ,
कब तक सूरज ,चाँद उगेंगे ,
कब तक धरती टिक पायेगी,
कब तक मन में नाद उठेंगे ,
में क्या बोलूँ -उत्तर देगा ,
इन्हीं कणों का कतरा -कतरा ,
देखो कोई फूल खिला है ,
इनकी भीगी नम पलकों पर ,
मैंने भी इक गीत लिखा है ,
इनकी बिखरी -सी अलकों पर ,
बस इतना सामान बचा है ,
बाकी सब तो है बस कचरा ,
बुधवार, 11 अगस्त 2010
आज मेरी है परीक्षा
ऐ वतन तेरे लिए
तोड़कर गजरा किसी ने
फूल तेरे नोच डाले
आँख में जो स्वप्न थे वो
दुश्मनों को बेच डाले
कौन सी तेरी ख़ुशी अब
रह गई है आज जिन्दा
कौन है जो आज तेरे
आंसुओं को पोंछ डाले
झूलती मन में अपेक्षा
ऐ वतन तेरे लिए
पर्व तेरे लग रहे हैं
आज फीके क्यों यहाँ पर
आदमी क्यों मिल रहे हैं
आज दिल से दिल बचाकर
कौन सा संताप तेरे
आज मन में चुभ रहा है
कौन -सी वो चीज है जो
छिन गई तुझसे यहाँ पर
दूंदने की है प्रतीज्ञा
ऐ वतन तेरे लिए
चाहता हूँ आज तेरे
पथ दुशालों से सजाऊँ
आज तेरी धडकनों में
धडकनें अपनी मिलाऊँ
आज तेरे पर्वतों पर
ताज धर दूँ इस धरा का
हों अँधेरे दूर जिससे
वो मशालें फिर जलाऊँ
आखिरी है ये प्रतीक्षा
ऐ वतन तेरे लिए
ऐ वतन तेरे लिए
तोड़कर गजरा किसी ने
फूल तेरे नोच डाले
आँख में जो स्वप्न थे वो
दुश्मनों को बेच डाले
कौन सी तेरी ख़ुशी अब
रह गई है आज जिन्दा
कौन है जो आज तेरे
आंसुओं को पोंछ डाले
झूलती मन में अपेक्षा
ऐ वतन तेरे लिए
पर्व तेरे लग रहे हैं
आज फीके क्यों यहाँ पर
आदमी क्यों मिल रहे हैं
आज दिल से दिल बचाकर
कौन सा संताप तेरे
आज मन में चुभ रहा है
कौन -सी वो चीज है जो
छिन गई तुझसे यहाँ पर
दूंदने की है प्रतीज्ञा
ऐ वतन तेरे लिए
चाहता हूँ आज तेरे
पथ दुशालों से सजाऊँ
आज तेरी धडकनों में
धडकनें अपनी मिलाऊँ
आज तेरे पर्वतों पर
ताज धर दूँ इस धरा का
हों अँधेरे दूर जिससे
वो मशालें फिर जलाऊँ
आखिरी है ये प्रतीक्षा
ऐ वतन तेरे लिए
सोमवार, 9 अगस्त 2010
किस्मतों को अब बदलने का
ज़माना आ गया है ,
आज लड़ना है किसी से ,
तो लड़ो उन बिजलियों से ,
जो चमन पर गिर रहीं हैं ,
आज बढना है यहाँ पर ,
तो चदो उन चोटियों पर ,
जो गगन से मिल रहीं हैं .
रौशनी को अब जगाने का ,
ज़माना आ गया है ,
उस धर्म को धिक्कार दो ,
जो आदमी को बाँट दे ,
उस रस्म को ललकार दो ,
जो जड़ किसी की काट दे ,
दोस्तों को आजमाने का ,
ज़माना आ गया है ,
ये वतन अपना वतन है ,
आन इसकी ,शान अपनी ,
हर तरह के फूल इसमें ,
है यही पहचान अपनी ,
इस वतन को जगमगाने का ,
ज़माना आगया है ,
बुझ न जाएँ वो मशालें ,
जो शहीदों ने जलाईं ,
सो रहीं थीं जो उमंगें ,
खून से अपने जगाईं ,
उन शहीदों को उठाने का ,
ज़माना आ गया है
ज़माना आ गया है ,
आज लड़ना है किसी से ,
तो लड़ो उन बिजलियों से ,
जो चमन पर गिर रहीं हैं ,
आज बढना है यहाँ पर ,
तो चदो उन चोटियों पर ,
जो गगन से मिल रहीं हैं .
रौशनी को अब जगाने का ,
ज़माना आ गया है ,
उस धर्म को धिक्कार दो ,
जो आदमी को बाँट दे ,
उस रस्म को ललकार दो ,
जो जड़ किसी की काट दे ,
दोस्तों को आजमाने का ,
ज़माना आ गया है ,
ये वतन अपना वतन है ,
आन इसकी ,शान अपनी ,
हर तरह के फूल इसमें ,
है यही पहचान अपनी ,
इस वतन को जगमगाने का ,
ज़माना आगया है ,
बुझ न जाएँ वो मशालें ,
जो शहीदों ने जलाईं ,
सो रहीं थीं जो उमंगें ,
खून से अपने जगाईं ,
उन शहीदों को उठाने का ,
ज़माना आ गया है
बुधवार, 4 अगस्त 2010
ऐ वतन तुम्हारे सीने में
धीरे -धीरे कुछ जलता है
कभी विरह में ,कभी अगन में ,
कभी विचारों की उलझन में
हो जाता है मौसम पागल
गंगा का पानी छलता है
कोई तुमको नोच रहा है
कोई तुमको बाँट रहा है
ताजमहल की दीवारों पर
काले अक्षर छाप रहा है
गरल पिलाने वाले तुमको
अन्दर ज्यादा ,बाहर कम हैं
चलती चाकी ,कबिरा रोया
मनुआ उसमें क्यों पिसता है
दर्द तुम्हारा जनगीता में
किस दिन अपनी कथा लिखेगा
कौन हजारों आंसू पीकर
कुर्बानी के सफ़े लिखेगा
दहन तुम्हारा करने वाले
आखिर खुद भी जल सकते हैं
कैसे उनको समझाएं अब
रोज शरम से सर झुकता है
ऐ वतन तुम्हारे .....
धीरे -धीरे कुछ जलता है
कभी विरह में ,कभी अगन में ,
कभी विचारों की उलझन में
हो जाता है मौसम पागल
गंगा का पानी छलता है
कोई तुमको नोच रहा है
कोई तुमको बाँट रहा है
ताजमहल की दीवारों पर
काले अक्षर छाप रहा है
गरल पिलाने वाले तुमको
अन्दर ज्यादा ,बाहर कम हैं
चलती चाकी ,कबिरा रोया
मनुआ उसमें क्यों पिसता है
दर्द तुम्हारा जनगीता में
किस दिन अपनी कथा लिखेगा
कौन हजारों आंसू पीकर
कुर्बानी के सफ़े लिखेगा
दहन तुम्हारा करने वाले
आखिर खुद भी जल सकते हैं
कैसे उनको समझाएं अब
रोज शरम से सर झुकता है
ऐ वतन तुम्हारे .....
मंगलवार, 3 अगस्त 2010
पूछ रहा है तुमसे पल -पल
रोज तुम्हारा हिंदुस्तान
वापस लाओगे तुम कब तक
इसके अधरों की मुस्कान
इसके अरमानों में कोई
अरमान तुम्हारा भी होगा
इसकी आँखों के तारों में
अभिमान तुम्हारा भी होगा
तुम चाहो तो ला सकते हो
इसमें कोई नया विहान
कहीं भूख है कहीं गरीबी
कहीं किसी की लाचारी है
कहीं घूस है ,कहीं लूट है
कहीं किसी की मक्कारी है
कुचल रहा है अपने घर में
अपने लोगों से इंसान
सबका हक़ सबको मिल जाए
अन्याय न तुमपर हो पाए
तुम जितनी मेहनत करते हो
उसका फल तुमको मिल जाए
आज तुम्हारे हाथों में है
इसका जैसे हर अभियान
तुम चाहो तो बदल के रख दो
इसके सारे अंध- विधान
रोज तुम्हारा हिंदुस्तान
वापस लाओगे तुम कब तक
इसके अधरों की मुस्कान
इसके अरमानों में कोई
अरमान तुम्हारा भी होगा
इसकी आँखों के तारों में
अभिमान तुम्हारा भी होगा
तुम चाहो तो ला सकते हो
इसमें कोई नया विहान
कहीं भूख है कहीं गरीबी
कहीं किसी की लाचारी है
कहीं घूस है ,कहीं लूट है
कहीं किसी की मक्कारी है
कुचल रहा है अपने घर में
अपने लोगों से इंसान
सबका हक़ सबको मिल जाए
अन्याय न तुमपर हो पाए
तुम जितनी मेहनत करते हो
उसका फल तुमको मिल जाए
आज तुम्हारे हाथों में है
इसका जैसे हर अभियान
तुम चाहो तो बदल के रख दो
इसके सारे अंध- विधान
सोमवार, 2 अगस्त 2010
बांध दो ऐसी हवा तुम
ये देश अपना -सा लगे
ये गाँव अपना -सा लगे
ये खेत अपना -सा लगे
साँस लेती -सी नजर
आने लगे फिर जिन्दगी
ये सुबह अपनी लगे
ये शाम अपनी -सी लगे
फर्ज कोई है हमारा
इस शिवालय के लिए
कौन -सी पह्चान दोगे
इस हिमालय के लिए
ताज से कह दो तुम्हारी
सुष्मिता लज्जित न हो
तक्षशिला की ज्ञान -गंगा
गर्व से वंचित न हो
खोल दो वो खिड़कियाँ
जो रौशनी छाने लगे
ये सभ्यता अपनी लगे
ये आदमी अपना लगे
भेद कोई हो न पाए
राम में रहमान में
डाल दो बुनियाद ऐसी
हजरते इंसान में
आस्थाओं से हमारी
ये वतन जुड़ता रहे
फूल इसके शीश पर हों
फूल सा खिलता रहे
हो हमारे बीच कोई
एकता मजबूत ऐसी
ये संस्कृति अपनी लगे
सम्मान अपना -सा लगे
ये देश अपना -सा लगे
ये गाँव अपना -सा लगे
ये खेत अपना -सा लगे
साँस लेती -सी नजर
आने लगे फिर जिन्दगी
ये सुबह अपनी लगे
ये शाम अपनी -सी लगे
फर्ज कोई है हमारा
इस शिवालय के लिए
कौन -सी पह्चान दोगे
इस हिमालय के लिए
ताज से कह दो तुम्हारी
सुष्मिता लज्जित न हो
तक्षशिला की ज्ञान -गंगा
गर्व से वंचित न हो
खोल दो वो खिड़कियाँ
जो रौशनी छाने लगे
ये सभ्यता अपनी लगे
ये आदमी अपना लगे
भेद कोई हो न पाए
राम में रहमान में
डाल दो बुनियाद ऐसी
हजरते इंसान में
आस्थाओं से हमारी
ये वतन जुड़ता रहे
फूल इसके शीश पर हों
फूल सा खिलता रहे
हो हमारे बीच कोई
एकता मजबूत ऐसी
ये संस्कृति अपनी लगे
सम्मान अपना -सा लगे
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