कतरे -कतरे दिल के बिखरे ,
जीने को बस हम जीते हैं ,
पता नहीं क्यों इस दुनिया का ,
एक समुन्दर गम पीते हैं ,
बिखरे -काँचों को जब बीना ,
किरचें उंगुलियों में चिपकीं ,
बिखरे आँसू को जब बीना ,
बूँदें ,होठों पर ही चिपकीं ,
इन बूँदों के ,इन किरचों के ,
खून भला कब कम होते हैं ,
नहीं पता था ,बिना तुम्हारे ,
नदियाँ ,पर्बत ,रह जायेंगे ,
नहीं पता था ,नभ के बादल ,
आँखों में ही घिर जायेंगे ,
ये नदियाँ ,ये पर्बत ,बादल ,
बिना तुम्हारे क्यों रोते हैं ,
कुछ तो ऐसी ,अगन पली है ,
बिना तुम्हारे शाम ढली है ,
उम्मीदों की एक सुबह भी ,
सीने में गुमनाम जली है ,
मुझसे मेरा हाल न पूछो ,
चिता- दहन क्यों नम होते हैं
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