बांध दो ऐसी हवा तुम
ये देश अपना -सा लगे
ये गाँव अपना -सा लगे
ये खेत अपना -सा लगे
साँस लेती -सी नजर
आने लगे फिर जिन्दगी
ये सुबह अपनी लगे
ये शाम अपनी -सी लगे
फर्ज कोई है हमारा
इस शिवालय के लिए
कौन -सी पह्चान दोगे
इस हिमालय के लिए
ताज से कह दो तुम्हारी
सुष्मिता लज्जित न हो
तक्षशिला की ज्ञान -गंगा
गर्व से वंचित न हो
खोल दो वो खिड़कियाँ
जो रौशनी छाने लगे
ये सभ्यता अपनी लगे
ये आदमी अपना लगे
भेद कोई हो न पाए
राम में रहमान में
डाल दो बुनियाद ऐसी
हजरते इंसान में
आस्थाओं से हमारी
ये वतन जुड़ता रहे
फूल इसके शीश पर हों
फूल सा खिलता रहे
हो हमारे बीच कोई
एकता मजबूत ऐसी
ये संस्कृति अपनी लगे
सम्मान अपना -सा लगे
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें