मंगलवार, 17 अगस्त 2010

एक नदी की धारा सूखी.
रेत कणों- सा जीवन बिखरा ,
जो भी आया यहाँ नहाने ,
आँखों से बस आँसू उतरा ,
पल दो पल का साथ यहाँ था ,
पल दो पल के थे सब साथी ,
किसने कितना साथ निभाया ,
किसने कितनी घात लगा दी ,
पता नहीं क्यों इन्हीं कणों में ,
चक्र ,समय का ,आकर उतरा ,
कोई मुझसे पूछ रहा है ,
कब तक सूरज ,चाँद उगेंगे ,
कब तक धरती टिक पायेगी,
कब तक मन में नाद उठेंगे ,
में क्या बोलूँ -उत्तर देगा ,
इन्हीं कणों का कतरा -कतरा ,
देखो कोई फूल खिला है ,
इनकी भीगी नम पलकों पर ,
मैंने भी इक गीत लिखा है ,
इनकी बिखरी -सी अलकों पर ,
बस इतना सामान बचा है ,
बाकी सब तो है बस कचरा ,

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