रविवार, 24 अक्टूबर 2010

वक्त शायद खींच लाये ,फिर तुम्हें अब पास मेरे ,
मुश्किलें जितनी खड़ीं थीं,मात सारी हो गईं हैं

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

मेरी आँखों में जो छायीं ,सिर्फ उसी की तस्वीरें हैं ,
शायद कोई संग- तराशी ,हाथ कटा तुमको मिल जाये
धुआं भरा जितना मुझमें , वो बाहर तो निकलेगा ही ,
शायद उसकी चादर में वो ,लिपटा चाँद तुम्हें दिख जाये

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

आओ मुझसे मिलकर रोलो ,सूनी-सूनी दीवारों तुम ,
शायद कोई ताजमहल का ,पत्थर तुम पर भी जड़ जाये

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

मेरे घर के बाहर इक जंगल उग आया है ,तरह -तरह की घासें ,
तरह के पौधे ,कुछ कोमल , कुछ नोकीले, झाड़ों का दंगल छाया है ,
कुछ गिलहरीं फुदकीं ,खरगोशों ने दौड़ लगाई ,रंग -बिरंगी तितलीं,
अलवेली -सी झूमीं ,
नन्ही -नन्ही चिड़ियों ने कलरव गाया है ,
तरुओं की शाखायें झुक - झुक कर लहराईं ,
फूलों पर यौवन गदराया है

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

कहते हैं जब वर्फ पिघलती ,नदियाँ ,सागर बन जाते हैं;
तेरे मेरे बीच कहीं ये ,छलक-छलक रह जाते हैं ;
इनकी सारी अनुगूंजों को ,गीत बनाकर रख लेता हूँ ;
अक्सर तुझको इन आँखों में ,कहीं बसाकर रख लेता हूँ ;
ओस बिछी है पूरे पथ पर,मैं तुझमें इतना भीगा हूँ;
कलियों के खिलने से पहले ,जिस्म गलाकर चल देता हूँ;
मेरी काया ,तेरी काया ,है मिट्टी का एक खिलौना ;
तेरी यादों की बस इसमें ,रूह मिलाकर चल देता हूँ ;

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

अक्सर तुझको इन आँखों में ,कहीं बसाकर रख लेता हूँ;
एक किरन जो छिटक गई है, उसे जलाकर रख लेता हूँ;
जीवन के ये लम्बे रस्ते ,चलने से जब भी कतराते ;
शर्तें तेरी जो होतीं थीं ,इन्हें सुनाकर चल देता हूँ ;
एक दिवस फिर बीता-बीता ,
एक दिवस फिर रीता-रीता,
एक दिवस में उठे कदम जो,
कोई कितना हारा ,जीता,
एक दिवस की यही कहानी ;
एक दिवस की यही रवानी,
एक दिवस में ,किसने कितनी ,
करली, अपनी हर मनमानी ;
एक दिवस कितनों के घर में ;
खुशहाली से भरकर बीता ;
कोई खाली हाथों लौटा ,
कोई भरकर जेबें लौटा ;
कोई अपने दिल के कतरे ,
इस दुनिया को देकर लौटा;
एक दिवस पनघट से घर तक;
कितना प्यासा-प्यासा लौटा;
एक दिवस कब पूरा होगा ;
नहीं पता है यहाँ किसी को ,
एक दिवस की धूप -छाँव में ;
खो जाना है यहाँ सभी को ;
एक दिवस भरमाया -सा था ;
एक दिवस कुछ करके बीता

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

आजकल आप पूरी तरह आजाद हैं ,चाहे जो लिखें ,सुबह से शाम तक की किसी मामूली
घटना का बर्णन करदें ,चाहे जो कुछ परोस दें ,लंगर लगा है ,कोई छंद -शास्त्र नहीं , कोई काव्य शास्त्र
नहीं कोई भावभूमि नहीं ,आप जो कुछ लिखेंगे लालू के दरवार में चलेगा ....
लेकिन छाया वादी कवियों की परम्परा बच्चन जी का हालावाद आज भी
अपने शीर्ष पर है ,उनके बाद के कवि हाशिये पर भी नहीं दिखाई देते ,लेने को दो चार के नाम लिए जा सकते हैं ,
लेकिन जो कुछ भी सामने आया है एक दम साधारण है ,कोई युग बोध नहीं ,कुछ भी विलक्षण नहीं
आधुनिक काल में नीरज के बाद या सन ,१९६५ से पत्र पत्रिकाओं में ,नयी कविता का दौर चल
पड़ा ,न जाने कितने प्रयोगवादी नुख्से अपनाये गये जो अब तक चले आ रहे हैं ,तुक और छंदों
वाली कविता का बहिष्कार किया गया ,नयी कविता में कुछ भी लिखना आसान है ,किसी शास्त्रीय
ज्ञान की आवश्कता नहीं ..
बचपन में एक फिकरा सुना था ---सूर -सूर ,तुलसी शशि ,उडगन केशवदास ,
अबके कवि खद्योत सम ,जेंह तेंह करत प्रकाश
क्या भक्ति काल-रीति काल जो एक परिपाटी पर केन्द्रित था आज भी
उतना ही सामयिक ,प्रासंगिक है ,क्या उनकी रचनायें आज के कवियों पर भारी
पड़ती हैं
इस युग में काव्य बिलकुल शब्द चित्र की तरह था ,भाषा चाहे अवधि हो या ब्रज गेय थी ,
हाँलाकि रस ,अलंकार,उपमाओं का प्रयोग था मगर कथ्य बास्तविक सा लगता था ,
काव्य के गुणों से भरपूर था
भावाव्यक्ति,काव्य सोन्दर्य के आधार पर चला ,सीता परम रुचिर मृग देखा ,या हे मृग ,हे मधुकर श्रेणि ,तुम देखीं
सीता मृग नयनी ,मीरा --हेरी मैं तो प्रेम दीवानी ,सूर --मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो ,बिहारी जिन दिन देखे वो कुसुम
सो गई बीत बहार

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

रामायण को गाकर ,गुनगुनाकर पदा जा सकता है ,छंदों तथा तुकबंदी का अपना अलग मजा है ,
नीरज तक यह परम्परा निर्वाध जारी रही ,उसके बाद निराला तथा अज्ञेय ने गीति काव्य पर ,
ऊँगली उठा दी ,उनके अनुसार छंदों में भाव व् बिचार खुलकर व्यक्त नहीं होते ,उन्होंने अतुकांत
कविता का श्रीगणेश कर दिया
तुलसीदास जी, की रामायण एक अवतार पुरुष की अमर गाथा है ,पूरा घटनाक्रम ,बहुत ही सरल तरीके से
लिखा गया है ,खड़ी बोली का पाठक ,अवधि में लिखी रचना को बिना प्रयास के ही समझ लेता है ,
रामायण की चोपाइयों में तुक व् मात्रा का प्रयोग है ,जो उसे गीति काव्य की श्रेणी में रखता है
रीति काल के प्रमुख कवियों में ,तुलसीदास,सूरदास ,बिहारी ,मीरा ,कबीर ,जायसी को पढना ,समझना जरूरी है ,
आधुनिक काल में सुभद्रा कुमारी चोहान ,महा देवी वर्मा ,सुमित्रा नंदन पन्त ,जय शंकर प्रसाद ,डाक्टर हरिवंश राय
बच्चन ,नीरज को पदे बिना कविता ज्ञान अधूरा ही माना जायेगा
हिंदी काव्य क्या ,कैसा है ,कैसा होना चाहिए ,रीति काल से आधुनिक काल तक उसमें
क्या जुड़ा,क्या शेष रहा ,क्या पसंद आया ,क्यों पसंद आया ,हम जब भी कुछ नया
लिखते हैं ,पीछे का पूरा घटना क्रम मस्तिष्क में होता है ...