मंगलवार, 11 जनवरी 2011

क्यों चमन में गुल यहाँ पर ,
इस कदर खिलने लगे हैं ,
एक बुलबुल डाल पर है ,
बस मुझे उससे मिला दो ,
बस मुझे अपने जिगर की ,
इन्तहां आकर बता दो,
पक्षियों तुम आज उड़कर,
आसमाँ की हद मिटा दो,

सोमवार, 10 जनवरी 2011

ये जगत चिरंतन है,जीवन चिरंतन है,अभिलाषाएं चिरंतन हैं,
बनना -बिगड़ना इसका खेल है,किसने रेत पर कितना सुन्दर
घरोंदा बनाया ,या चित्र बनाया ..आकर्षण का केंद्र बन जाता है ...
मनुष्य ने प्रलय को देखा है,झंझावातों को देखा है,उजड़ते आशियानों को देखा है,
टूटते सपनो को देखा है, ...फिर भी कोई सपना आँख में जीवित क्यों रह जाता है....?

रविवार, 9 जनवरी 2011

जीवन के तीन रूप हैं -स्वप्न जगत, प्रज्ञा जगत,द्रश्य जगत ,/
स्वप्न जगत, अव्यवस्थित है,मगर कभी -कभी निष्कर्ष पर पहुँच जाता है, /
प्रज्ञा जगत, व्यवस्थित है ,भविष्य को आयाम व आकार देता है/
द्रश्य जगत ,एक प्रत्यक्ष अनुभूति है जो .....

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

हम समेटे जा रहे हैं ,
उन लम्हों को रात -दिन ,
जो कभी तुमने दिए थे ,
जिन्दगी को रात -दिन ,
शब्द के तिनके पिरोकर ,
भावनायें गुँथ रहीं हैं ,
व्योम में भटकी हुई -सी ,
कल्पनायें मथ रहीं हैं ,
कुछ तुम्हारी आँच आकर ,
तन -बदन को छू रही है,
कुछ तुम्हारी रश्मियों से ,
अल्पनायें बन रहीं हैं ,
हम पलटते जा रहे हैं ,
उन खतों को रात -दिन ,
जो कभी तुमने लिखे थे ,
धडकनों से रात-दिन ,