क्यों चमन में गुल यहाँ पर ,
इस कदर खिलने लगे हैं ,
एक बुलबुल डाल पर है ,
बस मुझे उससे मिला दो ,
geetonkebadal-[6]
मंगलवार, 11 जनवरी 2011
सोमवार, 10 जनवरी 2011
रविवार, 9 जनवरी 2011
मंगलवार, 4 जनवरी 2011
हम समेटे जा रहे हैं ,
उन लम्हों को रात -दिन ,
जो कभी तुमने दिए थे ,
जिन्दगी को रात -दिन ,
शब्द के तिनके पिरोकर ,
भावनायें गुँथ रहीं हैं ,
व्योम में भटकी हुई -सी ,
कल्पनायें मथ रहीं हैं ,
कुछ तुम्हारी आँच आकर ,
तन -बदन को छू रही है,
कुछ तुम्हारी रश्मियों से ,
अल्पनायें बन रहीं हैं ,
हम पलटते जा रहे हैं ,
उन खतों को रात -दिन ,
जो कभी तुमने लिखे थे ,
धडकनों से रात-दिन ,
उन लम्हों को रात -दिन ,
जो कभी तुमने दिए थे ,
जिन्दगी को रात -दिन ,
शब्द के तिनके पिरोकर ,
भावनायें गुँथ रहीं हैं ,
व्योम में भटकी हुई -सी ,
कल्पनायें मथ रहीं हैं ,
कुछ तुम्हारी आँच आकर ,
तन -बदन को छू रही है,
कुछ तुम्हारी रश्मियों से ,
अल्पनायें बन रहीं हैं ,
हम पलटते जा रहे हैं ,
उन खतों को रात -दिन ,
जो कभी तुमने लिखे थे ,
धडकनों से रात-दिन ,
गुरुवार, 4 नवंबर 2010
चिर -दीपक लघु -पल -पल घुल-घुल ';
रजनी की पलकों में दुल-दुल ;
रचता संसृति की छवियों का ;
ज्योतिर्मय -मरकत रूप विपुल ;
झोंपड़ियों से प्रासादों तक ;
अवलि सजाकर किरण पुंज की ;
भर देता उदगारों से नव ;
पुलकावलियाँ अलसकुञ्ज की ;
विश्वासों का सूत्रधार यह ;
आशाओं का सृजनहार यह ;
अपनी कम्पित लौ से कितना ;
उंडलाता है अमित प्यार यह ;
शोषित --दलित -ग्रसित मानव का ;
परिचय देता रज काया से ,
संघर्षों का अग्रदूत यह ;
टकराता है हर छाया से
रजनी की पलकों में दुल-दुल ;
रचता संसृति की छवियों का ;
ज्योतिर्मय -मरकत रूप विपुल ;
झोंपड़ियों से प्रासादों तक ;
अवलि सजाकर किरण पुंज की ;
भर देता उदगारों से नव ;
पुलकावलियाँ अलसकुञ्ज की ;
विश्वासों का सूत्रधार यह ;
आशाओं का सृजनहार यह ;
अपनी कम्पित लौ से कितना ;
उंडलाता है अमित प्यार यह ;
शोषित --दलित -ग्रसित मानव का ;
परिचय देता रज काया से ,
संघर्षों का अग्रदूत यह ;
टकराता है हर छाया से
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