रविवार, 3 अक्टूबर 2010

रामायण को गाकर ,गुनगुनाकर पदा जा सकता है ,छंदों तथा तुकबंदी का अपना अलग मजा है ,
नीरज तक यह परम्परा निर्वाध जारी रही ,उसके बाद निराला तथा अज्ञेय ने गीति काव्य पर ,
ऊँगली उठा दी ,उनके अनुसार छंदों में भाव व् बिचार खुलकर व्यक्त नहीं होते ,उन्होंने अतुकांत
कविता का श्रीगणेश कर दिया

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें