गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

ओस बिछी है पूरे पथ पर,मैं तुझमें इतना भीगा हूँ;
कलियों के खिलने से पहले ,जिस्म गलाकर चल देता हूँ;
मेरी काया ,तेरी काया ,है मिट्टी का एक खिलौना ;
तेरी यादों की बस इसमें ,रूह मिलाकर चल देता हूँ ;

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