geetonkebadal-[6]
गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010
ओस बिछी है पूरे पथ पर,मैं तुझमें इतना भीगा हूँ;
कलियों के खिलने से पहले ,जिस्म गलाकर चल देता हूँ;
मेरी काया ,तेरी काया ,है मिट्टी का एक खिलौना ;
तेरी यादों की बस इसमें ,रूह मिलाकर चल देता हूँ ;
1 टिप्पणी:
Anamikaghatak
14 अक्टूबर 2010 को 5:21 am बजे
bahut sundar rachana ..........bhavpoorna
जवाब दें
हटाएं
उत्तर
जवाब दें
टिप्पणी जोड़ें
ज़्यादा लोड करें...
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
bahut sundar rachana ..........bhavpoorna
जवाब देंहटाएं