बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

एक दिवस फिर बीता-बीता ,
एक दिवस फिर रीता-रीता,
एक दिवस में उठे कदम जो,
कोई कितना हारा ,जीता,
एक दिवस की यही कहानी ;
एक दिवस की यही रवानी,
एक दिवस में ,किसने कितनी ,
करली, अपनी हर मनमानी ;
एक दिवस कितनों के घर में ;
खुशहाली से भरकर बीता ;
कोई खाली हाथों लौटा ,
कोई भरकर जेबें लौटा ;
कोई अपने दिल के कतरे ,
इस दुनिया को देकर लौटा;
एक दिवस पनघट से घर तक;
कितना प्यासा-प्यासा लौटा;
एक दिवस कब पूरा होगा ;
नहीं पता है यहाँ किसी को ,
एक दिवस की धूप -छाँव में ;
खो जाना है यहाँ सभी को ;
एक दिवस भरमाया -सा था ;
एक दिवस कुछ करके बीता

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