बुधवार, 11 अगस्त 2010

आज मेरी है परीक्षा
ऐ वतन तेरे लिए
तोड़कर गजरा किसी ने
फूल तेरे नोच डाले
आँख में जो स्वप्न थे वो
दुश्मनों को बेच डाले
कौन सी तेरी ख़ुशी अब
रह गई है आज जिन्दा
कौन है जो आज तेरे
आंसुओं को पोंछ डाले
झूलती मन में अपेक्षा
ऐ वतन तेरे लिए
पर्व तेरे लग रहे हैं
आज फीके क्यों यहाँ पर
आदमी क्यों मिल रहे हैं
आज दिल से दिल बचाकर
कौन सा संताप तेरे
आज मन में चुभ रहा है
कौन -सी वो चीज है जो
छिन गई तुझसे यहाँ पर
दूंदने की है प्रतीज्ञा
ऐ वतन तेरे लिए
चाहता हूँ आज तेरे
पथ दुशालों से सजाऊँ
आज तेरी धडकनों में
धडकनें अपनी मिलाऊँ
आज तेरे पर्वतों पर
ताज धर दूँ इस धरा का
हों अँधेरे दूर जिससे
वो मशालें फिर जलाऊँ
आखिरी है ये प्रतीक्षा
ऐ वतन तेरे लिए

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