सोमवार, 9 अगस्त 2010

किस्मतों को अब बदलने का
ज़माना आ गया है ,
आज लड़ना है किसी से ,
तो लड़ो उन बिजलियों से ,
जो चमन पर गिर रहीं हैं ,
आज बढना है यहाँ पर ,
तो चदो उन चोटियों पर ,
जो गगन से मिल रहीं हैं .
रौशनी को अब जगाने का ,
ज़माना आ गया है ,
उस धर्म को धिक्कार दो ,
जो आदमी को बाँट दे ,
उस रस्म को ललकार दो ,
जो जड़ किसी की काट दे ,
दोस्तों को आजमाने का ,
ज़माना आ गया है ,
ये वतन अपना वतन है ,
आन इसकी ,शान अपनी ,
हर तरह के फूल इसमें ,
है यही पहचान अपनी ,
इस वतन को जगमगाने का ,
ज़माना आगया है ,
बुझ न जाएँ वो मशालें ,
जो शहीदों ने जलाईं ,
सो रहीं थीं जो उमंगें ,
खून से अपने जगाईं ,
उन शहीदों को उठाने का ,
ज़माना आ गया है

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