ऐ वतन तुम्हारे सीने में
धीरे -धीरे कुछ जलता है
कभी विरह में ,कभी अगन में ,
कभी विचारों की उलझन में
हो जाता है मौसम पागल
गंगा का पानी छलता है
कोई तुमको नोच रहा है
कोई तुमको बाँट रहा है
ताजमहल की दीवारों पर
काले अक्षर छाप रहा है
गरल पिलाने वाले तुमको
अन्दर ज्यादा ,बाहर कम हैं
चलती चाकी ,कबिरा रोया
मनुआ उसमें क्यों पिसता है
दर्द तुम्हारा जनगीता में
किस दिन अपनी कथा लिखेगा
कौन हजारों आंसू पीकर
कुर्बानी के सफ़े लिखेगा
दहन तुम्हारा करने वाले
आखिर खुद भी जल सकते हैं
कैसे उनको समझाएं अब
रोज शरम से सर झुकता है
ऐ वतन तुम्हारे .....
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