शनिवार, 24 जुलाई 2010

संभल -संभल कर सांसें चलती
यादों में जब तुम आती हो
एक हवा का झोंका बनकर
मुझमें जैसे छा जाती हो
भीगा -भीगा कोई मौसम
मेरे चारों ओर खड़ा है
इस मौसम की पलकों में तुम
सपने भी कुछ भर जाती हो
रचते -रचते सूरत कोई
सिर्फ तुम्हारी रच जाती है
आँखें जब तक खुल कर देखें
ऊषानभ में छा जाती है
मन में जितना सूनापन है
उसका कोई छोर नहीं है
विस्तृत जग में सिवा तुम्हारे
दूजा कोई और नहीं है
सात -जनम के परिवेशों से
गुजर -गुजर कर तुम आती हो
विरह -मिलन के अनुभावों में
प्यार असीमित भर जाती हो

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