सोमवार, 12 जुलाई 2010

इस धड़कती शाम ने क्या
दिल तुम्हारा छू लिया है
बात मेरी कुछ नहीं है
ये अभी तो सिलसिला है ,
आपका कोई तबस्सुम
शाम में सिमटा हुआ है
ये नयी कोई गजल है
या जरा -सा फासला है ,
शाम डूबी जा रही है
आपसे पूछे बिना ही
शाम को कैसे बताएं
आपमें जो जलजला है

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