गुरुवार, 29 जुलाई 2010

प्यार क्या है ,पूछना मत
उस कली से ,जो खिली है
आंसुओं की ओस पीकर
रूप क्या है ,पूछना मत
भोर की पहली किरन से
जो उगी है धूप बनकर
और मैं क्या हूँ यहाँ पर
पूछना मत जिन्दगी से
जो उड़ी है खाक बनकर
हो सके तो बस जरा सा
दर्द पी लो ,आचमन में
जो उमड़कर बह रहा है
गीत मैंने क्यों लिखे हैं
पूछना मत ,उस पवन से
जो मलय -सा बह रहा है
इस जगत का दुन्द में हूँ
और हूँ आकार भी कुछ
क्या बचा है शेष मुझमें-
पूछना मत तितलियों से
रंग जो छिटका चमन में
क्या संदेसा दे रहा है

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