मोहब्बत का ये आलम है
हवाएं गुनगुनाई हैं
घिरे आकाश में बादल
जमीनें भी नहायीं हैं
चलो हम मान लेते हैं
तुम्हारा प्यार बरसा है
मगर क्यों आँख में अबतक
निशायें डबडबायीं हैं
सड़क पर साथ भीगे थे
समंदर में नहाये थे
हमारे मखमली से पल
नजारों ने चुराए थे
बहारें खुद लिपटतीं थीं
तुम्हारे तन-बदन से जब
सुबह से शाम तक वो दिन
इशारों में बिताये थे
हरारत का ये आलम है
दिशाएं सनसनायीं हैं
तुम्हारी याद के बादल
बरसते छोड़ आयीं हैं
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