रविवार, 18 जुलाई 2010

बुझ गया मन आज ऐसे
ढल रही है शाम जैसे
मैं सिसक कर रो उठा हूँ
रो रही है वात जैसे
घिर रही पर्छाइयाँ कुछ
इस तरह मेरे नयनं में
उम्र की देकर किसी ने
छीन ली सौगात जैसे
वो चमकता रूप देखो
एक गीला अश्रु बनकर
प्रीत की सारी कहानी
कह रहा चुप चाप ढलकर
खुल रहीं हैं दर्द की परतें
छितिज की ओट में यों
उड़ रहे हैं जिस तरह से
बादलों के पाल सर -सर
वो किनारा दूर है तो
ये किनारा भी अछूता
कौन ऐसा पुन्य है जो
पाप से पहले न छूटा
व्यक्तित्व जितना भी उठा
आदर्श उतने गिर गए
मैं मनुजता के लिए भी
जी न पाया ,रोज टूटा
इस घुमड़ती रागिनी के
स्वर बहुत बिखरे हुए हैं
झूमकरअब क्या सुनाऊं
गीत के टुकड़े हुए हैं
शून्य -सा फैला हुआ है
कांपता आँचल किसी का
मैं लिपटकर ओढ़ लूँगा
अंग भी ठिठुरे हुए हैं
मानलूँगाअब समय की
भीत को विश्वास अपना
और बिखरे केश दर्पण में
न देखूंगा कभी भी
आ गया हूँ इन सुलगती
वादियों में लडखडा कर
क्या पराजित भावना से
पा सकूंगा कुछ कभी भी
बुझ गया मन .............

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