मंगलवार, 13 जुलाई 2010

छुपे -छुपे ही रह जाते हैं
अक्सर आँखों में कुछ आंसू
जीने वाले जी लेते हैं
पी -पी कर ही अपने आंसू .
कोई ऐसा दर्द नहीं है
जो आंसू में नहीं नहाया
कोई ऐसा प्यार नहीं है
जिसने मन को नहीं तपाया .
तपते -तपते रह जाते हैं
भीगे -मौसम में कुछ आंसू .
ये आंसू की अविरल गंगा
सदियों से बहती आई है
मन के कितने अंगारों की
बूंदों से प्यास बुझाई है .
बुझते -बुझते रह जाते हैं
दीपक की लौ जैसे आंसू .
आंसू जब तक गीत लिखें ना
गीत न पूरा हो पाता है
आंसू जबतक भाप बने ना
मीत न कोई मिल पाता है
मिलते - मिलते रह जाते हैं
तेरे आंसू में ये आंसू

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