बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

मेरे घर के बाहर इक जंगल उग आया है ,तरह -तरह की घासें ,
तरह के पौधे ,कुछ कोमल , कुछ नोकीले, झाड़ों का दंगल छाया है ,
कुछ गिलहरीं फुदकीं ,खरगोशों ने दौड़ लगाई ,रंग -बिरंगी तितलीं,
अलवेली -सी झूमीं ,
नन्ही -नन्ही चिड़ियों ने कलरव गाया है ,
तरुओं की शाखायें झुक - झुक कर लहराईं ,
फूलों पर यौवन गदराया है

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