geetonkebadal-[6]
गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010
कहते हैं जब वर्फ पिघलती ,नदियाँ ,सागर बन जाते हैं;
तेरे मेरे बीच कहीं ये ,छलक-छलक रह जाते हैं ;
इनकी सारी अनुगूंजों को ,गीत बनाकर रख लेता हूँ ;
अक्सर तुझको इन आँखों में ,कहीं बसाकर रख लेता हूँ ;
1 टिप्पणी:
संजय भास्कर
14 अक्टूबर 2010 को 10:27 pm बजे
गजब कि पंक्तियाँ हैं ...
बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...
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गजब कि पंक्तियाँ हैं ...
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...